ईरान पर हमला हुआ तो कौन-कौन से मुस्लिम देश आएंगे साथ, जानें किसके साथ कैसे हैं रिश्ते?

Iranian President Ayatollah
मिडिल ईस्ट एक बार फिर उबाल पर है. ईरान में अंदरूनी हालात बिगड़े हुए हैं, सड़कों पर लाखों लोग सरकार के खिलाफ खड़े हैं और अमेरिका खुलकर चेतावनी दे चुका है. अगर हालात ने युद्ध का रूप लिया और ईरान पर हमला हुआ, तो सवाल सिर्फ जंग का नहीं होगा, बल्कि यह भी तय होगा कि मुस्लिम दुनिया किस तरफ खड़ी होगी. क्या ईरान अकेला पड़ेगा या उसे समर्थन मिलेगा? आइए समझें कि युद्ध के दरम्यान मुस्लिम देशों की हवा किस ओर बहेगी?

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ईरान संकट की पृष्ठभूमि क्या है?

ईरान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र और कई यूरोपीय देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने उसकी अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई है. महंगाई चरम पर है, ईरानी रियाल की कीमत लगातार गिर रही है और आम लोगों की जिंदगी मुश्किल होती जा रही है. इसी आर्थिक दबाव ने बीते दो हफ्तों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों को जन्म दिया है.

शुरुआत में ये प्रदर्शन महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ थे, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की सत्ता और नेतृत्व के खिलाफ खुली चुनौती में बदल गया. बीते 18 दिनों में हिंसा, झड़पों और दमन में 2000 से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं.

ओमान की मध्यस्थ भूमिका

ओमान को खाड़ी क्षेत्र का सबसे संतुलित और शांतिप्रिय देश माना जाता है. उसने अतीत में ईरान और पश्चिमी देशों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई है. 2015 के ईरान परमाणु समझौते में भी ओमान की बैक-चैनल डिप्लोमेसी अहम रही थी. अगर युद्ध होता है, तो ओमान न तो अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने देगा और न ही किसी का पक्ष लेगा. उसकी भूमिका शांति और बातचीत तक सीमित रहेगी. 

मिस्र क्यों रहेगा सतर्क?

मिस्र अमेरिका का पुराना रणनीतिक साझेदार है और उसे बड़ी सैन्य मदद मिलती है. वहीं, ईरान के साथ उसके रिश्ते न तो बहुत करीबी हैं और न ही पूरी तरह दुश्मनी वाले हैं. मिस्र की प्राथमिकता गाजा, सिनाई प्रायद्वीप और स्वेज नहर की सुरक्षा है. ऐसे में वह किसी भी बड़े युद्ध से दूरी बनाए रखेगा और संयम की अपील करेगा

जॉर्डन की चिंता

जॉर्डन एक छोटा लेकिन रणनीतिक रूप से अहम देश है. उसके ईरान के साथ सीमित संबंध हैं, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों से उसके रिश्ते मजबूत हैं. संघर्ष की स्थिति में जॉर्डन अपने हवाई क्षेत्र और सीमाओं की सुरक्षा पर ध्यान देगा, लेकिन सीधे सैन्य भागीदारी से बचेगा.

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